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बिस्मिल साबरी

1937

ग़ज़ल 3

 

शेर 4

वो अक्स बन के मिरी चश्म-ए-तर में रहता है

अजीब शख़्स है पानी के घर में रहता है

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जब आया ईद का दिन घर में बेबसी की तरह

तो मेरे फूल से बच्चों ने मुझ को घेर लिया

निकल के तो गया गहरे पानियों से मगर

कई तरह के सराबों ने मुझ को घेर लिया

चित्र शायरी 1

वो अक्स बन के मिरी चश्म-ए-तर में रहता है अजीब शख़्स है पानी के घर में रहता है