डॉ. अब्दुल्लाह के शेर
रूह बेचैन है इतनी कि दु'आ करता हूँ
'उम्र की क़ैद से मिल जाए रिहाई मुझ को
ख़िज़ाँ का तो मौसम गुज़र ही गया है
हरे पात पेड़ों पे आने लगे हैं
ये आँखें ये 'आरिज़ ये लब और गेसू
इन्हीं के सबब हम ठिकाने लगे हैं
गर्दिश-ए-वक़्त ये किस मोड़ पे लाई मुझ को
अपनी हर साँस भी लगती है पराई मुझ को
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ज़ख़्म गहरे हैं मगर उफ़ भी नहीं कर सकता
अच्छी लगती नहीं अपनों की बुराई मुझ को
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