एजाज़ गीलानी के शेर
मैं जो खा लेता हूँ दो मुर्ग़-मुसल्लम हर रोज़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere