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एज़ाज़ अहमद आज़र

1942 | पाकिस्तान

ग़ज़ल 3

 

शेर 3

वो सारी ख़ुशियाँ जो उस ने चाहीं उठा के झोली में अपनी रख लीं

हमारे हिस्से में उज़्र आए जवाज़ आए उसूल आए

बिछड़ने वाले ने वक़्त-ए-रुख़्सत कुछ इस नज़र से पलट के देखा

कि जैसे वो भी ये कह रहा हो तुम अपने घर का ख़याल रखना

इन उजड़ी बस्तियों का कोई तो निशाँ रहे

चूल्हे जलें कि घर ही जलें पर धुआँ रहे

 

पुस्तकें 3

Kab Subha Milan Hogi

 

1999

Titli Phool Aur Chand

Bachcho Ke Liye Namein Aur Geet

1998

Zamna Bade Shauq Se Sunn Raha Tha

Ashfaq Ahmad

2004