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फ़रीद जावेद

1927 - 1977 | कराची, पाकिस्तान

गुफ़्तुगू किसी से हो तेरा ध्यान रहता है

टूट टूट जाता है सिलसिला तकल्लुम का

हमें भी अपनी तबाही पे रंज होता है

हमारे हाल-ए-परेशाँ पे मुस्कुराओ नहीं

तरब का रंग मोहब्बत की लौ नहीं देता

तरब के रंग में कुछ दर्द भी समो लें आज