फ़रहान सय्यद के शेर
किसी भी काम का छोड़ा नहीं मुझे जिस ने
वो शख़्स आज मुझे एक काम कह रहा है
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जितना तुम्हारा ज़र्फ़ है मिल जाऊँगा तुम्हें
दरिया भी मेरा रूप है क़तरा भी दस्तयाब
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मिलती नहीं है चीज़ कोई भी जगह पे अब
मैं अपने हम-सफ़र की नफ़ासत से तंग हूँ
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ज़िया'-ए-वक़्त है ऐसी ज़िया भी
बहुत इस में ज़ियाँ रक्खा हुआ है
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इक सलीब-ए-वक़्त पर सय्यद हिमायत में मिरी
जब कोई बोला नहीं मैं इंतिक़ामन चुप रहा
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उस की तरकीब मत बदल 'सय्यद'
तू उसे हस्ब-ए-ज़ाइक़ा न बना
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