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फ़ज़्ल ताबिश

1933 - 1995 | भोपाल, भारत

ग़ज़ल 13

शेर 10

कमरे में के बैठ गई धूप मेज़ पर

बच्चों ने खिलखिला के मुझे भी जगा दिया

रात को ख़्वाब बहुत देखे हैं

आज ग़म कल से ज़रा हल्का है

कर शुमार कि हर शय गिनी नहीं जाती

ये ज़िंदगी है हिसाबों से जी नहीं जाती

सुनते हैं कि इन राहों में मजनूँ और फ़रहाद लुटे

लेकिन अब आधे रस्ते से लौट के वापस जाए कौन

वही दो-चार चेहरे अजनबी से

उन्हीं को फिर से दोहराना पड़ेगा

पुस्तकें 5

Allama Iqbal: Bachchon Ke Liye Nazmein

 

 

Bahar Raqs Mein Hai

 

 

Intekhab-e-Manzoomat-o-Masnaviyat

 

1988

Jharoka

 

1991

Maulana Barkatullah Bhopali

 

1889

Shumara Number-002

1967

 

ऑडियो 9

इस कमरे में ख़्वाब रक्खे थे कौन यहाँ पर आया था

उसे मालूम है मैं सर-फिरा हूँ

ख़्वाहिशों के हिसार से निकलो

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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