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जोर्ज पेश शोर

1823 - 1894 | मेरठ, भारत

जोर्ज पेश शोर के शेर

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दिल में अपने आरज़ू सब कुछ है और फिर कुछ नहीं

दो जहाँ की जुस्तुजू सब कुछ है और फिर कुछ नहीं

गुज़िश्ता साल जो देखा वो अब की साल नहीं

ज़माना एक सा बस हर बरस नहीं चलता

इक नज़र ने किया है काम तमाम

आरज़ू भी तो थी यही दिल की

देते दिल जो तुम को तो क्यूँ बनती जान पर

कुछ आप की ख़ता थी अपना क़ुसूर था

इसी ख़याल में दिन-रात मैं तड़पता हूँ

तुम्हीं क़रार भी दोगे जो बे-क़रार किया

ज़र्रे की तरह ख़ाक में पामाल हो गए

वो जिन का आसमाँ पे सर-ए-पुर-ग़ुरूर था

तुम्हारे इश्क़ में क्या क्या इख़्तियार किया

कभी फ़लक का कभी ग़ैर का वक़ार किया

जहाँ में ज़र का है कारख़ाना कोई अपना है यगाना

तलाश-ए-दौलत में है ज़माना ख़ुदा ही हाफ़िज़ है मुफ़्लिसी का

उस माह-रू पे आँख किसी की पड़ सकी

जल्वा था तूर का कि सरासर वो नूर था

दूर हम से हैं वो तो क्या डर है

पास है अपने आरसी दिल की

है तलाश-ए-दो-जहाँ लेकिन ख़बर अपनी किसे

जीते-जी तक जुस्तुजू सब कुछ है और फिर कुछ नहीं

अदम से हस्ती में जब हम आए कोई हमदर्द साथ लाए

जो अपने थे वो हुए पराए अब आसरा है तो बेकसी का

जान पर अपनी हाए क्यूँ बनती

बात जो मानते कभी दिल की

शौक़ ने की जो रहबरी दिल की

मंज़िल-ए-इश्क़ तय हुई दिल की

जब जवानी गई छुड़ा कर हाथ

उस पे पीरी कुछ चली दिल की

हवा के घोड़े पे रहता है वो सवार मुदाम

किसी का उस के बराबर फ़रस नहीं चलता

रुके है आमद-ओ-शुद में नफ़स नहीं चलता

यही है हुक्म-ए-इलाही तो बस नहीं चलता

इक ख़याल-ओ-ख़्वाब है 'शोर' ये बज़्म-ए-जहाँ

यार और जाम-ओ-सुबू सब कुछ है और फिर कुछ नहीं

पैक-ए-ख़याल भी है अजब क्या जहाँ-नुमा

आया नज़र वो पास जो अपने से दूर था

नहीं है टूटे की बूटी जहान में पैदा

शिकस्ता जब हुआ तार-ए-नफ़स नहीं चलता

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