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गुलनार आफ़रीन

1942 | कराची, पाकिस्तान

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एक आँसू याद का टपका तो दरिया बन गया

ज़िंदगी भर मुझ में एक तूफ़ान सा पलता रहा

'गुलनार' मस्लहत की ज़बाँ में बात कर

वो ज़हर पी के देख जो सच्चाइयों में है

वो चराग़-ए-ज़ीस्त बन कर राह में जलता रहा

हाथ में वो हाथ ले कर उम्र भर चलता रहा

किन शहीदों के लहू के ये फ़रोज़ाँ हैं चराग़

रौशनी सी जो है ज़िंदाँ के हर इक रौज़न में

सफ़र का रंग हसीं क़ुर्बतों का हामिल हो

बहार बन के कोई अब तो हम-सफ़र आए

दिल का हर ज़ख़्म तिरी याद का इक फूल बने

मेरे पैराहन-ए-जाँ से तिरी ख़ुशबू आए

एक परछाईं तसव्वुर की मिरे साथ रहे

मैं तुझे भूलूँ मगर याद मुझे तू आए

क्या बात है क्यूँ शहर में अब जी नहीं लगता

हालाँकि यहाँ अपने पराए भी वही हैं

हम सर-ए-राह-ए-वफ़ा उस को सदा क्या देते

जाने वाले ने पलट कर हमें देखा भी था

हमें भी अब दर दीवार घर के याद आए

जो घर में थे तो हमें आरज़ू-ए-सहरा थी

कहिए आईना-ए-सद-फ़स्ल-ए-बहाराँ तुझ को

कितने फूलों की महक है तिरे पैराहन में

बग़ैर सम्त के चलना भी काम ही गया

फ़सील-ए-शहर के बाहर भी एक दुनिया थी

ये तिलिस्म-ए-मौसम-ए-गुल नहीं कि ये मोजज़ा है बहार का

वो कली जो शाख़ से गिर गई वो सबा की गोद में पल गई