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हैदर अली जाफ़री

ग़ज़ल 6

शेर 7

आए ठहरे और रवाना हो गए

ज़िंदगी क्या है, सफ़र की बात है

ख़ून मज़दूर का मिलता जो तामीरों में

हवेली महल और कोई घर होता

भुला पाया उसे जिस को भूल जाना था

वफ़ाओं से मिरा रिश्ता बहुत पुराना था