कौन बदन से आगे देखे औरत को

सब की आँखें गिरवी हैं इस नगरी में

तिरे गीतों का मतलब और है कुछ

हमारा धुन सरासर मुख़्तलिफ़ है

सितारा है कोई गुल है कि दिल है

तिरी ठोकर में पत्थर मुख़्तलिफ़ है

फ़ज़ा यूँही तो नहीं मल्गजी हुई जाती

कोई तो ख़ाक-नशीं होश खो रहा होगा