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हसरत मोहानी

1878 - 1951 | दिल्ली, भारत

स्वतंत्रता सेनानी और संविधान सभा के सदस्य। ' इंक़िलाब ज़िन्दाबाद ' का नारा दिया। कृष्ण भक्त , अपनी ग़ज़ल ' चुपके चुपके, रात दिन आँसू बहाना याद है ' के लिए प्रसिद्ध

स्वतंत्रता सेनानी और संविधान सभा के सदस्य। ' इंक़िलाब ज़िन्दाबाद ' का नारा दिया। कृष्ण भक्त , अपनी ग़ज़ल ' चुपके चुपके, रात दिन आँसू बहाना याद है ' के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल

अपना सा शौक़ औरों में लाएँ कहाँ से हम

नोमान शौक़

आप ने क़द्र कुछ न की दिल की

नोमान शौक़

उन को जो शुग़्ल-ए-नाज़ से फ़ुर्सत न हो सकी

नोमान शौक़

ख़ू समझ में नहीं आती तिरे दीवानों की

नोमान शौक़

छुप के उस ने जो ख़ुद-नुमाई की

नोमान शौक़

तोड़ कर अहद-ए-करम ना-आश्ना हो जाइए

नोमान शौक़

देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना

नोमान शौक़

दिल को ख़याल-ए-यार ने मख़्मूर कर दिया

नोमान शौक़

दिल में क्या क्या हवस-ए-दीद बढ़ाई न गई

नोमान शौक़

निगाह-ए-यार जिसे आश्ना-ए-राज़ करे

नोमान शौक़

बदल-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार कहाँ से लाऊँ

नोमान शौक़

भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं

नोमान शौक़

महरूम-ए-तरब है दिल-ए-दिल-गीर अभी तक

नोमान शौक़

रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम

नोमान शौक़

वो चुप हो गए मुझ से क्या कहते कहते

नोमान शौक़

सियहकार थे बा-सफ़ा हो गए हम

नोमान शौक़

है मश्क़-ए-सुख़न जारी चक्की की मशक़्क़त भी

नोमान शौक़

हम ने किस दिन तिरे कूचे में गुज़ारा न किया

नोमान शौक़

हुस्न-ए-बे-परवा को ख़ुद-बीन ओ ख़ुद-आरा कर दिया

नोमान शौक़

अक़्ल से हासिल हुई क्या क्या पशीमानी मुझे

ख़ालिद मुबश्शिर

क्या तुम को इलाज-ए-दिल-ए-शैदा नहीं आता

ख़ालिद मुबश्शिर

क़िस्मत-ए-शौक़ आज़मा न सके

ख़ालिद मुबश्शिर

दर्द-ए-दिल की उन्हें ख़बर न हुई

ख़ालिद मुबश्शिर

पैहम दिया प्याला-ए-मय बरमला दिया

ख़ालिद मुबश्शिर

फ़ैज़-ए-मोहब्बत से है क़ैद-ए-मिहन

ख़ालिद मुबश्शिर

बेकली से मुझे राहत होगी

ख़ालिद मुबश्शिर

रोग दिल को लगा गईं आँखें

ख़ालिद मुबश्शिर

हमें वक़्फ़-ए-ग़म सर-ब-सर देख लेते

ख़ालिद मुबश्शिर

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI