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हस्तीमल हस्ती

1946 | राजस्थान, भारत

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प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है

नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है

कुछ और सबक़ हम को ज़माने ने सिखाए

कुछ और सबक़ हम ने किताबों में पढ़े थे

हमें पसंद नहीं जंग में भी मक्कारी

जिसे निशाने पे रक्खें बता के रखते हैं

मुझ से जल्दी हार कर मेरा हरीफ़

जीतने का लुत्फ़ सारा ले गया

कहीं ख़ुलूस कहीं दोस्ती कहीं पे वफ़ा

बड़े क़रीने से घर को सजा के रखते हैं

ख़ुद चराग़ बन के जल वक़्त के अंधेरे में

भीक के उजालों से रौशनी नहीं होती

दिल की हालत पूछने वालो

देखो कोई फूल मसल के

खेल ज़िंदगी के तुम खेलते रहो यारो

हार जीत कोई भी आख़िरी नहीं होती

ये तजरबा हुआ है मोहब्बत की राह में

खो कर मिला जो हम को वो पा कर नहीं मिला

दिल में जो मोहब्बत की रौशनी नहीं होती

इतनी ख़ूबसूरत ये ज़िंदगी नहीं होती

लुत्फ़ आराम का तू क्या जाने

कभी वक़्त ठहर मेरे साथ

तेरी बीनाई किसी दिन छीन लेगा देखना

देर तक रहना तिरा ये आइनों के दरमियाँ

वो जो क़िस्से में था शामिल वही कहता है मुझे

मुझ को मालूम नहीं यार ये क़िस्सा क्या है

बैठते जब हैं खिलौने वो बनाने के लिए

उन से बन जाते हैं हथियार ये क़िस्सा क्या है