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हातिम अली मेहर

1815 - 1879

मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन और मित्र हाई कोर्ट के वकील एवं माननीय मजिस्ट्रेट

मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन और मित्र हाई कोर्ट के वकील एवं माननीय मजिस्ट्रेट

हातिम अली मेहर

ग़ज़ल 49

अशआर 68

अपना बातिन ख़ूब है ज़ाहिर से भी जान-ए-जाँ

आँख के लड़ने से पहले जी लड़ा बैठे हैं हम

हम भी बातें बनाया करते हैं

शेर कहना मगर नहीं आता

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अबरू का इशारा किया तुम ने तो हुई ईद

जान यही है मह-ए-शव्वाल हमारा

दाग़ों की बस दिखा दी दिवाली में रौशनी

हम सा होगा कोई जहाँ में दिवालिया

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दोनों रुख़्सार इनायत करें इक इक बोसा

आशिक़ों के लिए सरकार से चंदा हो जाए

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पुस्तकें 8

 

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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