noImage

इफ़्तिख़ार आज़मी

1935 - 1977

ग़ज़ल 4

 

नज़्म 8

शेर 4

हुस्न यूँ इश्क़ से नाराज़ है अब

फूल ख़ुश्बू से ख़फ़ा हो जैसे

कितना सुनसान है रस्ता दिल का

क़ाफ़िला कोई लुटा हो जैसे

शोर-ए-दरिया-ए-वफ़ा इशरत-ए-साहिल के क़रीब

रुक गए अपने क़दम आए जो मंज़िल के क़रीब

पुस्तकें 3

अरमुग़ान-ए-हरम

 

1960

Kun

 

1977

ताबिश-ए-सुहेल

 

1958