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इमामुल-मुहद्दिसीन और सहीह बुख़ारी के संकलक

इमामुल-मुहद्दिसीन और सहीह बुख़ारी के संकलक

इमाम बुख़ारी का परिचय

मूल नाम : मोहम्मद

जन्म :बुखारा

निधन : बुखारा

पहचान: इमामुल-मुहद्दिसीन, सहीह बुख़ारी के संकलक और इल्म-ए-हदीस के सबसे महान इमामों में शुमार मुहद्दिस

इमाम अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन इस्माईल बुख़ारी का जन्म 810 ईस्वी (13 शव्वाल 194 हिजरी) में बुख़ारा में हुआ। आप एक विद्वान और धार्मिक परिवार से संबंध रखते थे। आपके पिता इस्माईल बिन इब्राहीम स्वयं एक प्रतिष्ठित मुहद्दिस और इमाम मालिक के शिष्य थे। कम आयु में ही पिता के निधन के बाद आपकी परवरिश आपकी माता ने की, जो अपनी परहेज़गारी और इबादतगुज़ारी के लिए प्रसिद्ध थीं।

इमाम बुख़ारी ने बचपन से ही असाधारण बुद्धिमत्ता और स्मरणशक्ति का परिचय दिया तथा कम आयु में ही हदीस के अध्ययन और संरक्षण का कार्य आरंभ कर दिया। बाद में आपने इल्म-ए-हदीस की प्राप्ति के लिए बुख़ारा, निशापुर, बग़दाद, मक्का, मदीना, मिस्र, शाम और अन्य अनेक ज्ञान-केंद्रों की यात्राएँ कीं। कहा जाता है कि आपने एक हज़ार से अधिक उस्तादों से ज्ञान प्राप्त किया, जिनमें इमाम अहमद बिन हम्बल, अली बिन अल-मदीनी, यह्या बिन मुईन और इस्हाक बिन राहविया जैसे महान विद्वान शामिल हैं।

इमाम बुख़ारी की सबसे महान विद्वतापूर्ण उपलब्धि अल-जामिअ अस-सहीह है, जो सामान्यतः सहीह बुख़ारी के नाम से प्रसिद्ध है। यह हदीस-ए-नबवी की वह सर्वाधिक प्रामाणिक पुस्तक मानी जाती है जिसे उम्मत-ए-मुस्लिमह में क़ुरआन करीम के बाद सबसे अधिक विश्वसनीय और मान्य स्थान प्राप्त है। इमाम बुख़ारी ने छह लाख हदीसों के विशाल भंडार में से अत्यंत कठोर मानदंडों के आधार पर इस ग्रंथ के लिए हदीसों का चयन किया। इस महान ग्रंथ की रचना पूर्ण करने में उन्हें सोलह वर्ष लगे।

आप केवल मुहद्दिस ही नहीं बल्कि साहिब-ए-इज्तिहाद फ़क़ीह भी थे। यद्यपि फ़िक़्ही दृष्टि से आप पर इमाम शाफ़ेई का प्रभाव स्पष्ट था, तथापि अनेक मसलों में आपने स्वतंत्र मत व्यक्त किया। सहीह बुख़ारी के अध्याय आपके फ़िक़्ही विवेक और इज्तिहादी क्षमता के दर्पण माने जाते हैं।

सहीह बुख़ारी के अतिरिक्त आपकी अन्य प्रमुख कृतियों में अल-अदब अल-मुफ़रद, अत-तारीख अल-कबीर, अत-तारीख अल-अवसत, अत-तारीख अस-सगीर, ख़लक़ अफ़आल अल-इबाद और रफ़अल-यदैन शामिल हैं।

निधन: 870 ईस्वी (1 शव्वाल 256 हिजरी) को ख़रतंग, समरक़ंद के निकट आपका निधन हुआ। आपका मज़ार आज भी अहल-ए-इल्म और अक़ीदतमंदों के लिए मरकज़-ए-अक़ीदत है।

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