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इम्तियाज़ साग़र

पाकिस्तान

ग़ज़ल 13

शेर 3

उसी दरख़्त को मौसम ने बे-लिबास किया

मैं जिस के साए में थक कर उदास बैठा था

होगा बहुत शदीद तमाज़त का इंतिक़ाम

साए से मिल के रोएगी दीवार देखना

हैं घर की मुहाफ़िज़ मिरी दहकी हुई आँखें

मैं ताक़ में रख आया हूँ जलती हुई आँखें

 

पुस्तकें 1

Sehra Ki Hawa

 

1995