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इन्दिरा वर्मा

1940 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल

अभी से कैसे कहूँ तुम को बेवफ़ा साहब

रेखा भारद्वाज

आज फिर चाँद उस ने माँगा है

सुदीप बनर्जी

उस से मत कहना मिरी बे-सर-ओ-सामानी तक

इन्दिरा वर्मा

कुछ बला और कुछ सितम ही सही

सुदीप बनर्जी

कभी मुड़ के फिर इसी राह पर न तो आए तुम न तो आए हम

इन्दिरा वर्मा

काश वो पहली मोहब्बत के ज़माने आते

इन्दिरा वर्मा

तमाम फ़िक्र ज़माने की टाल देता है

शोमा बनर्जी

तिरे ख़याल का चर्चा तिरे ख़याल की बात

राधिका चोपड़ा

दिल के बेचैन जज़ीरों में उतर जाएगा

इन्दिरा वर्मा

दिल से अपने ख़ुद-ब-ख़ुद कुछ पूछिए मेरे लिए

सुदीप बनर्जी

दोस्त जब ज़ी-वक़ार होता है

राधिका चोपड़ा

मुझे रंग दे न सुरूर दे मिरे दिल में ख़ुद को उतार दे

इन्दिरा वर्मा

मोहब्बत में आया है तन्हा अभी रंग

सुदीप बनर्जी

ये मौसम सुरमई है और मैं हूँ

सुदीप बनर्जी

यूँ वफ़ा के सारे निभाओ ग़म कि फ़रेब में भी यक़ीन हो

रेखा भारद्वाज

ये शफ़क़ चाँद सितारे नहीं अच्छे लगते

राधिका चोपड़ा

वो अजीब शख़्स था भीड़ में जो नज़र में ऐसे उतर गया

रेखा भारद्वाज

शफ़क़ के रंग निकलने के बाद आई है

सुदीप बनर्जी

शिकस्ता-दिल अँधेरी शब अकेला राहबर क्यूँ हो

सुदीप बनर्जी

हज़ार ख़्वाब लिए जी रही हैं सब आँखें

राधिका चोपड़ा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI