ग़ज़ल 5

 

शेर 6

नश्शा था ज़िंदगी का शराबों से तेज़-तर

हम गिर पड़े तो मौत उठा ले गई हमें

ज़ख़्म जो तू ने दिए तुझ को दिखा तो दूँ मगर

पास तेरे भी नसीहत के सिवा है और क्या

जाने किस शहर में आबाद है तू

हम हैं बर्बाद यहाँ तेरे बाद

अकेले पार उतर के बहुत है रंज मुझे

मैं उस का बोझ उठा कर भी तैर सकता था

ग़म-ए-हयात ने बख़्शे हैं सारे सन्नाटे

कभी हमारे भी पहलू में दिल धड़कता था

पुस्तकें 2

Khwab Sa Kuchh

 

2005

Shumara Number-003

1996

 

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