एक ही शय थी ब-अंदाज़-ए-दिगर माँगी थी

मैं ने बीनाई नहीं तुझ से नज़र माँगी थी

तमाम मज़हर-ए-फ़ितरत तिरे ग़ज़ल-ख़्वाँ हैं

ये चाँदनी भी तिरे जिस्म का क़सीदा है

तारीकियों के पार चमकती है कोई शय

शायद मिरे जुनून-ए-सफ़र की उमंग है

उन से मिलने का मंज़र भी दिल-चस्प था 'असर'

इस तरफ़ से बहारें चलीं और उधर से खिज़ाएँ चलीं

तू भी तो हटा जिस्म के सूरज से अंधेरे

ये महकी हुई रात भी महताब-ब-कफ़ है