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जाफ़र ताहिर

1917 - 1977 | पाकिस्तान

ग़ज़ल 15

शेर 9

वतन जब भी सर-ए-दश्त कोई फूल खिला

देख कर तेरे शहीदों की निशानी रोया

आपस की गुफ़्तुगू में भी कटने लगी ज़बाँ

अब दोस्तों से तर्क-ए-मुलाक़ात चाहिए

'ताहिर' ख़ुदा की राह में दुश्वारियाँ सही

इश्क़-ए-बुताँ में कौन सी आसानियाँ रहीं

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इक उम्र भटकते हुए गुज़री है जुनूँ में

अब कौन फ़रेब-ए-निगह-ए-यार में आए

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उट्ठी थी पहली बार जिधर चश्म-ए-आरज़ू

वो लोग फिर मिले वो बस्ती नज़र पड़ी