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जावेद अकरम फ़ारूक़ी

1960 | अमरोहा, भारत

ग़ज़ल 8

शेर 6

ख़ाक-ए-वतन अब तो वफ़ाओं का सिला दे

मैं टूटती साँसों की फ़सीलों पे खड़ा हूँ

मुस्कुराने की सज़ा मिलती रही

मुस्कुराने की ख़ता करते रहे

कितना मुश्किल हुआ जवाब मुझे

कितना आसान था सवाल उस का

ई-पुस्तक 13

Dariya Bahta Jata Hai

 

1995

Hanger Par Latki Zindagi

 

1985

करब-ए-अना

 

1988

Nariyal Ke Darakhton Ki Parchhaiyan

 

1987

Neem Tarasheeda Sanam

 

1982

"अमरोहा" के और शायर

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