जुनेद आज़र के शेर
कितने जज़्बे तिरी बे-राह-रवी ने कुचले
हर्फ़-ए-आवारा ज़रा देख के चल काग़ज़ पर
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere