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ख़ालिद मोईन

1962 | पाकिस्तान

ख़ालिद मोईन

ग़ज़ल 11

शेर 13

मोहब्बत की तो कोई हद, कोई सरहद नहीं होती

हमारे दरमियाँ ये फ़ासले, कैसे निकल आए

लकीरें खींचते रहने से बन गई तस्वीर

कोई भी काम हो, बे-कार थोड़ी होता है

अजब पुर-लुत्फ़ मंज़र देखता रहता हूँ बारिश में

बदन जलता है और मैं भीगता रहता हूँ बारिश में

हाथ छुड़ा कर जाने वाले

मैं तुझ को अपना समझा था

मैं ने तुझ को मंज़िल जाना

तू मुझ को रस्ता समझा था

पुस्तकें 3

Be Mausam Wahshat

 

1992

Be-Mosam Wahshat

 

1992

Inhimaak

 

2002