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Khalid Mubashshir's Photo'

ख़ालिद मुबश्शिर

1980 | दिल्ली, भारत

ख़ालिद मुबश्शिर के शेर

मिरी वहशतों का सबब कौन समझे

कि मैं गुम-शुदा क़ाफ़िला चाहता हूँ

टपक के दीदा-ए-नम से सदाएँ देता है

जो एक हर्फ़-ए-तमन्ना दिल-ए-तबाह में था

तुम्हारी याद का मरहम बनाम-ए-दिल कर दूँ

तमाम हिज्र के ज़ख़्मों को मुंदमिल कर दूँ

तुम्हारी याद का मरहम बनाम-ए-दिल कर दूँ

तमाम हिज्र के ज़ख़्मों को मुंदमिल कर दूँ

अनासिर की घनी ज़ंजीर है

सो ये हस्ती की इक ताबीर है

मुझे शक है होने होने पे 'ख़ालिद'

अगर हूँ तो अपना पता चाहता हूँ

दश्त-ए-जुनूँ से गए शहर-ए-ख़िरद में हम

दिल को मगर ये सानेहा अच्छा नहीं लगा

कहीं राँझा, कहीं मजनूँ हुआ

वजूद-ए-इश्क़ आलमगीर है

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