noImage

ख़ालिद सिद्दीक़ी

ख़ालिद सिद्दीक़ी के शेर

इक और खेत पक्की सड़क ने निगल लिया

इक और गाँव शहर की वुसअत में खो गया

बहुत तन्हा है वो ऊँची हवेली

मिरे गाँव के इन कच्चे घरों में

ये कैसी हिजरतें हैं मौसमों में

परिंदे भी नहीं हैं घोंसलों में

बे-कार है बे-म'अनी है अख़बार की सुर्ख़ी

लिक्खा है जो दीवार पे वो ग़ौर-तलब है

यूँ अगर घटते रहे इंसाँ तो 'ख़ालिद' देखना

इस ज़मीं पर बस ख़ुदा की बस्तियाँ रह जाएँगी

जो आँख की पुतली में रहा नूर की सूरत

वो शख़्स मिरे घर के अँधेरे का सबब है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI