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ख़ालिद सुहैल

1952 | टोरंटो, कनाडा

ख़ालिद सुहैल

ग़ज़ल 3

 

नज़्म 3

 

अशआर 2

कश्तियाँ मज़बूत सब बह जाएँगी सैलाब में

काग़ज़ी इक नाव मेरी ज़ात की रह जाएगी

हमारे दौर की तारीकियाँ मिटाने को

सहाब-ए-दर्द से ख़ुशियों का चाँद उभरा है

 

पुस्तकें 18

"टोरंटो" के और शायर

 

Recitation

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