Kumar Vishwas's Photo'

कुमार विश्वास

1970 | दिल्ली, भारत

1.15K
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है

मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है

उसी की तरह मुझे सारा ज़माना चाहे

वो मिरा होने से ज़्यादा मुझे पाना चाहे

दिल के तमाम ज़ख़्म तिरी हाँ से भर गए

जितने कठिन थे रास्ते वो सब गुज़र गए

मिरा ख़याल तिरी चुप्पियों को आता है

तिरा ख़याल मिरी हिचकियों को आता है

जब से मिला है साथ मुझे आप का हुज़ूर

सब ख़्वाब ज़िंदगी के हमारे सँवर गए

जिस्म चादर सा बिछ गया होगा

रूह सिलवट हटा रही होगी

आदमी होना ख़ुदा होने से बेहतर काम है

ख़ुद ही ख़ुद के ख़्वाब की ताबीर बन कर देख ले

फिर मिरी याद रही होगी

फिर वो दीपक बुझा रही होगी

अपने ही आप से इस तरह हुए हैं रुख़्सत

साँस को छोड़ दिया जिस सम्त भी जाना चाहे

चारों तरफ़ बिखर गईं साँसों की ख़ुशबुएँ

राह-ए-वफ़ा में आप जहाँ भी जिधर गए