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लईक़ आजिज़

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वो धूप थी कि ज़मीं जल के राख हो जाती

बरस के अब के बड़ा काम कर गया पानी

में चाहता हूँ तअल्लुक़ के दरमियाँ पर्दा

वो चाहता है मिरे हाल पर नज़र करना

मिरे पाँव के छालो मिरे हम-राह रहो

इम्तिहाँ सख़्त है तुम छोड़ के जाते क्यूँ हो

दुश्मनों को दोस्त भाई को सितमगर कह दिया

लोग क्यूँ बरहम हैं क्या शीशे को पत्थर कह दिया

शाम होते ही बुझ गया 'आजिज़'

एक मुफ़्लिस का ख़्वाब था रहा

मेरी तारीक शबों में है उजाला इन से

चाँद से ज़ख़्मों पे मरहम ये लगाते क्यूँ हो

किरनों को वो बाज़ार में बेच आया है

शायद कि कई दिन से था भूका सूरज

खेतियाँ छालों की होती थीं लहू उगते थे

कितना ज़रख़ेज़ था वो दर-बदरी का मौसम

क़लम उठाऊँ कि बच्चों की ज़िंदगी देखूँ

पड़ा हुआ है दोराहे पे अब हुनर मेरा

तर्क-ए-जाम-ओ-सुबू कर पाए

इस लिए हम वज़ू कर पाए

मुझे तो जो भी मिला है अज़ाब की सूरत

मिरी हयात है इक तिश्ना ख़्वाब की सूरत