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मातम फ़ज़ल मोहम्मद

1815 - 1897 | हैदराबाद, पाकिस्तान

ग़ज़ल 9

शेर 24

पूजता हूँ कभी बुत को कभी पढ़ता हूँ नमाज़

मेरा मज़हब कोई हिन्दू मुसलमाँ समझा

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ख़त देख कर मिरा मिरे क़ासिद से यूँ कहा

क्या गुल नहीं हुआ वो चराग़-ए-सहर हनूज़

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कोई आज़ाद हो तो हो यारो

हम तो हैं इश्क़ के असीरों में

रुख़्सार का दे शर्त नहीं बोसा-ए-लब से

जो जी में तिरे आए सो दे यार मगर दे

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जहाँ से हूँ यहाँ आया वहाँ जाऊँगा आख़िर को

मिरा ये हाल है यारो मुस्तक़बिल माज़ी हूँ

पुस्तकें 1

दीवान-ए-मातम

दीवान-ए-उर्दू

1990

 

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