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मर्दान अली खां राना

- 1879

ग़ज़ल 12

शेर 49

तेरे आते ही देख राहत-ए-जाँ

चैन है सब्र है क़रार है आज

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पूछो हम-सफ़रो मुझ से माजरा-ए-वतन

वतन है मुझ पे फ़िदा और मैं फ़िदा-ए-वतन

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प्यार की बातें कीजिए साहब

लुत्फ़ सोहबत का गुफ़्तुगू से है

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उठाया उस ने बीड़ा क़त्ल का कुछ दिल में ठाना है

चबाना पान का भी ख़ूँ बहाने का बहाना है

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पड़ा हूँ मैं यहाँ और दिल वहीं है

इलाही मैं कहीं हूँ वो कहीं है

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पुस्तकें 5

Ghuncha-e-Raag

 

1896

Ghuncha-e-Raag

 

1863

Kulliyat-e-Nizam

 

1875

नवा-ए-ग़रीब

 

1863

Shola-e-Jwaala

Majmua Wasokht, Volume-002

 

 

चित्र शायरी 1

राह-ए-उल्फ़त में मुलाक़ात हुई किस किस से दश्त में क़ैस मिला कोह में फ़रहाद मुझे

 

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