मीर फ़ैज़ अली के शेर
दिन रात आग ही में दिल को लुटा रहे हैं
दाग़-ए-फ़िराक़ उस के छाती जला रहे हैं
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कभी उस ज़ुल्फ़ से टुक लग चले हों तो कहें तुम से
दिल-ए-पुर-आरज़ू रखते हैं यूँही मार मार अपना
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कह दिया सब से जो कि था मा'लूम
दिल तिरा हौसला हुआ मा'लूम
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ये तुर्क-ए-चश्म तिरे मस्त हैं जवाँ दोनों
कि सो रहे हैं तले सर के रख कमाँ दोनों
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