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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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मेह्र अली के शेर

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ये सोच कर वुजूद फ़रामोश कर दिया

ख़ुद से मिला तो तेरी तमन्ना करूँगा मैं

मैं नहीं जानता कहाँ हूँ मैं

इन दिनों ख़ुद से राब्ता ही नहीं

इक 'उम्र तेरे साथ चला भी तो क्या मिला

अब सोचता हूँ तुझ से बिछड़ कर ही देख लूँ

ज़र्द से सब्ज़ होता जाता है

इक शजर इंतिज़ार से निकला

उस एक लम्हे में दोस्त साथ साथ हैं हम

वो एक लम्हा जो इम्कान में नहीं आया

मुझ में अब मेरी जगह बाक़ी नहीं

मैं तिरी मौजूदगी से भर गया

अपने अंदर जो भरी जस्त तो हैरानी हुई

इस कुएँ में सभी कुछ मेरे 'अलावा निकला

तलाश करता है हर गाम कारवाँ हम को

हवा-ए-दश्त बुला ले गई कहाँ हम को

अनगिनत नक़्श बना लेंगे ये नक़्क़ाश मगर

हुस्न महताब का महताब में रह जाएगा

देखी है 'उम्र भर यही बे-चेहरा काएनात

दो चार पल वुजूद के अंदर ही देख लूँ

हस्ब-ए-मा'मूल एक मोड़ पे आज

देर तक तेरा इंतिज़ार हुआ

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