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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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मेह्र अली

ग़ज़ल 6

नज़्म 7

अशआर 11

इक 'उम्र तेरे साथ चला भी तो क्या मिला

अब सोचता हूँ तुझ से बिछड़ कर ही देख लूँ

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मैं नहीं जानता कहाँ हूँ मैं

इन दिनों ख़ुद से राब्ता ही नहीं

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अनगिनत नक़्श बना लेंगे ये नक़्क़ाश मगर

हुस्न महताब का महताब में रह जाएगा

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अपने अंदर जो भरी जस्त तो हैरानी हुई

इस कुएँ में सभी कुछ मेरे 'अलावा निकला

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मुझ में अब मेरी जगह बाक़ी नहीं

मैं तिरी मौजूदगी से भर गया

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