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मिद्हत-उल-अख़्तर

1945 | औरंगाबाद, भारत

ग़ज़ल 19

शेर 12

लाई है कहाँ मुझ को तबीअत की दो-रंगी

दुनिया का तलबगार भी दुनिया से ख़फ़ा भी

जाने वाले मुझे कुछ अपनी निशानी दे जा

रूह प्यासी रहे आँख में पानी दे जा

हम को उसी दयार की मिट्टी हुई अज़ीज़

नक़्शे में जिस का नाम-पता अब नहीं रहा

ई-पुस्तक 2

Charon Or

 

1968

Munafiqon Mein Roz-o-Shab

 

1980

 

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