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मियाँ दाद ख़ां सय्याह

1829/30 - 1907 | सूरत, भारत

ग़ज़ल 8

शेर 2

क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो

ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो

तुर्रा-ए-काकुल-ए-पेचां रुख़-ए-नूरानी पर

चश्मा-ए-आईना में साँप सा लहराता है

 

पुस्तकें 1

Miyan Daad Khan Sayyah Aur Unka Kalam

 

1957

 

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