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मुमताज़ मीरज़ा

1929 - 1997 | दिल्ली, भारत

मुमताज़ मीरज़ा के शेर

आगही भूलने देती नहीं हस्ती का मआल

टूट के ख़्वाब बिखरता है तो हँस देते हैं

रात काटे नहीं कटती है किसी सूरत से

दिन तो दुनिया के बखेड़ों में गुज़र जाता है

जाने कब निगह-ए-बाग़बाँ बदल जाए

हर आन फूलों को धड़का लगा सा रहता है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

बोलिए