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मुंशी खैराती लाल शगुफ़्ता

ग़ज़ल 7

शेर 14

अदब बख़्शा है ऐसा रब्त-ए-अल्फ़ाज़-ए-मुनासिब ने

दो-ज़ानू है मिरी तब-ए-रसा तरकीब-ए-उर्दू से

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शरमाओ आँखें मिला कर तो देखो

मुलाक़ात है हम से तुम से कभी की

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देखो निगाह-ए-शौक़ से मेरी तरफ़ मुझे

ये मुद्दआ' है और कोई मुद्दआ' नहीं

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मिरी जानिब को करवट ले के गर मुझ से लिपट जाओ

अभी देने लगे मिरी तरह तुम को दुआ करवट

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मुझ को रोते देख कर पास आए वो तफ़्हीम को

क्यूँ दिल से दूँ दुआएँ अपने ग़ैन मीम को

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पुस्तकें 1

Nuskha-e-Shagraf

 

1897