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आलोचक और शायर

आलोचक और शायर

मालूम नहीं नींद किसे कहते हैं लेकिन

करता तो हूँ इक काम मैं सोने की तरह का

कुछ दिनों दश्त भी आबाद हुआ चाहता है

कुछ दिनों के लिए अब शहर को वीरानी दे

इश्क़ में ख़ैर था जुनूँ लाज़िम

अब कोई दूसरा हुनर भी करूँ

दिल का शजर तो और भी पलने की आड़ में

मुरझा गया है फूलने-फलने के नाम पर

कभी तो यूँ कि मकाँ के मकीं नहीं होते

कभी कभी तो मकीं का मकाँ नहीं होता

कभी तो लगता है ये उज़्र-ए-लंग है वर्ना

मुझे तो कुफ़्र ने इस्लाम पर लगाया हुआ है