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नादिम नदीम

1994 | कासगंज, भारत

नई नस्ल के नुमाइंदा शायरों में शामिल, आम फ़हम ज़बान में रिवायती और नाज़ुक एहसासात की शायरी, ख़ास तौर पर इश्क़िया मज़ामीन का बयान

नई नस्ल के नुमाइंदा शायरों में शामिल, आम फ़हम ज़बान में रिवायती और नाज़ुक एहसासात की शायरी, ख़ास तौर पर इश्क़िया मज़ामीन का बयान

नादिम नदीम के शेर

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इन से उम्मीद रख हैं ये सियासत वाले

ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले

सवाल ये है हवा आई किस इशारे पर

चराग़ किस के बुझे ये सवाल थोड़ी है

पर कटे पंछियों से पूछते हो

तुम में उड़ने का हौसला है क्या

फूल कितने उदास लगते हैं

ख़ुदा इन को तितलियाँ दे दे

उस ने दो लफ़्ज़ में जो बातें कहीं थी मुझ से

उस को मैं सोचने बैठूँ तो ज़माने लग जाएँ

हिज्र-ए-जानाँ में भी आँसू नहीं आए मेरे

ख़ुश्क सहराओं में बरसात कभी तो होगी

मैं जिस दरिया में काँटा डालता था

सुना है अब वहाँ मछली नहीं है

वन-वास नहीं होते सभी चौदह बरस के

कुछ लोग हमेशा को चले जाते हैं वन में

आवाज़ लगाई कभी तलवार गिराई

आगाह किया हम ने उसे वार से पहले

मिरे दोस्त मिरे साथ तिरी यादों की

रेत इतनी है हुआ जाता है सहरा चेहरा

इक रात की देवी के परस्तार हैं हम लोग

देती है मिसालें जो तिरे साँवले-पन की

हम ने भुगता है पता है हमें क्या है दुनिया

सिर्फ़ इक दाना-ए-गंदुम की सज़ा है दुनिया

था सफ़र हम पे मुसल्लत सो हमें चलना था

वर्ना ये दिल तो कई बार हुआ रुक जाते

एक हम ख़ुद के हैं इक घर के हैं इक दुनिया के

तुम अगर पा भी सकोगे तो हमें चौथाई

दौड़ती हाँपती आई थी उदासी मुझ तक

मेरे सीने से लगी और ज़रा सुस्ताई

बदलते मौसमों का हाथ थामे चलने वालो

सुकूँ पहुँचाएगी तुम को शजर-कारी हमारी

वहशत नहीं है रक़्स-ए-मसर्रत है दश्त में

पेड़ों की शक्ल में ये मिरे चार-सू हो तुम

दीं-दार लोग रब को मनाने में मस्त हैं

दरवेश अपने नाचने गाने में मस्त हैं

मैं हूँ वो है सहरा है

और इक पेड़ का साया है

कैसे कैसे लोग वुजूद की ज़द में कर मर गए

इस दरिया की भेंट चढ़े कैसे कैसे तैराक

ख़मोशी खींच के लाई मुझे वुजूद तलक

वुजूद खींच के लाया है मुझ को ला की तरफ़

आह को साज़ बनाते हैं दुखों की रुत में

दिल-शिकस्ता हैं पर आवाज़ सँभाले हुए हैं

क्या नय्या और कैसा खेवय्या चाहने वालो डूब मरो

इन आँखों के दरियाओं में आज भँवर भरपूर पड़े हैं

प्रेम-नगर में माँगने वाले भूखों मर जाते हैं

इस बस्ती में खा नहीं सकता कोई छीन-झपट के

बिखेरता है रौशनी रिदा-ए-आसमाँ से वो

सितारे जैसे ओढ़नी में पड़ गए हों दाग़ से

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