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नासिर शहज़ाद

1937 - 2007 | ओकाड़ा, पाकिस्तान

ग़ज़ल 44

शेर 29

अख़रोट खाएँ तापें अँगेठी पे आग

रस्ते तमाम गाँव के कोहरे से अट गए

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फिर यूँ हुआ कि मुझ से वो यूँही बिछड़ गया

फिर यूँ हुआ कि ज़ीस्त के दिन यूँही कट गए

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नय्या बाँधो नदी किनारे सखी

चाँद बैराग रात त्याग लगे

तुझ से मिली निगाह तो देखा कि दरमियाँ

चाँदी के आबशार थे सोने की राह थी

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याद आए तू मुझ को बहुत जब शब कटे जब पौ फटे

जब वादियों में दूर तक कोहरा दिखे बे-अंत सा

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पुस्तकें 1

Ban-Baas

 

2004

 

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