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नासिर शहज़ाद

1937 - 2007 | ओकाड़ा, पाकिस्तान

ग़ज़ल 44

शेर 28

अख़रोट खाएँ तापें अँगेठी पे आग

रस्ते तमाम गाँव के कोहरे से अट गए

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एक काटा राम ने सीता के साथ

दूसरा बन बॉस मेरे नाम पर

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फिर यूँ हुआ कि मुझ से वो यूँही बिछड़ गया

फिर यूँ हुआ कि ज़ीस्त के दिन यूँही कट गए

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ई-पुस्तक 1

Ban-Baas

 

2004

 

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