ग़ज़ल 10

शेर 9

मिरी वफ़ा है मिरे मुँह पे हाथ रक्खे हुए

तू सोचता है कि कुछ भी नहीं समझता मैं

चंद पेड़ों को ही मजनूँ की दुआ होती है

सब दरख़्तों पे तो पत्थर नहीं आया करता

रास आएगी मोहब्बत उस को

जिस से होते नहीं वादे पूरे

मुझ पे तस्वीर लगा दी गई है

क्या मैं दीवार दिखाई दिया हूँ

चाहिए है मुझे इंकार-ए-मोहब्बत मिरे दोस्त

लेकिन इस में तिरा इंकार नहीं चाहिए है

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