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ज़िया ज़मीर

1977 | मुरादाबाद, भारत

ग़ज़ल 31

नज़्म 2

 

शेर 4

उस को जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ

रोकते किस तरह वो शख़्स हमारा था कहाँ

कुछ ज़ुल्म सितम सहने की आदत भी है हम को

कुछ ये है कि दरबार में सुनवाई भी कम है

दर्द की धूप ढले ग़म के ज़माने जाएँ

देखिए रूह से कब दाग़ पुराने जाएँ

ई-पुस्तक 1

Khwab Khwab Lamhe

 

2010

 

चित्र शायरी 3

 

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