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दुष्यंत कुमार

1933 - 1975 | मुरादाबाद, भारत

ग़ज़ल 10

हिंदी ग़ज़ल 14

शेर 20

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो

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कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए

कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए

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एक आदत सी बन गई है तू

और आदत कभी नहीं जाती

you are now like a habit to me

and from a habit one, cannot be free

you are now like a habit to me

and from a habit one, cannot be free

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चित्र शायरी 6

अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए तिरी सहर हो मिरा आफ़्ताब हो जाए हुज़ूर आरिज़-ओ-रुख़्सार क्या तमाम बदन मिरी सुनो तो मुजस्सम गुलाब हो जाए उठा के फेंक दो खिड़की से साग़र-ओ-मीना ये तिश्नगी जो तुम्हें दस्तियाब हो जाए वो बात कितनी भली है जो आप करते हैं सुनो तो सीने की धड़कन रबाब हो जाए बहुत क़रीब न आओ यक़ीं नहीं होगा ये आरज़ू भी अगर कामयाब हो जाए ग़लत कहूँ तो मिरी आक़िबत बिगड़ती है जो सच कहूँ तो ख़ुदी बे-नक़ाब हो जाए

एक आदत सी बन गई है तू और आदत कभी नहीं जाती

 

वीडियो 10

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