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जलील ’आली’

1945 | रावलपिंडी, पाकिस्तान

ग़ज़ल 41

शेर 19

दिल आबाद कहाँ रह पाए उस की याद भुला देने से

कमरा वीराँ हो जाता है इक तस्वीर हटा देने से

रास्ता सोचते रहने से किधर बनता है

सर में सौदा हो तो दीवार में दर बनता है

दिल पे कुछ और गुज़रती है मगर क्या कीजे

लफ़्ज़ कुछ और ही इज़हार किए जाते हैं

पुस्तकें 3

अर्ज़-ए-हुनर से आगे

 

2007

ख़्वाब दरीचा

 

2004

Shauq Sitara

 

1998

 

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