अफ़ज़ल मिनहास

ग़ज़ल 18

शेर 21

अपनी बुलंदियों से गिरूँ भी तो किस तरह

फैली हुई फ़ज़ाओं में बिखरा हुआ हूँ मैं

उजली उजली ख़्वाहिशों पर नींद की चादर डाल

याद के रौज़न से कुछ ताज़ा हवा भी आएगी

चाँद में कैसे नज़र आए तिरी सूरत मुझे

आँधियों से आसमाँ का रंग मैला हो गया

वो दौर अब कहाँ कि तुम्हारी हो जुस्तुजू

इस दौर में तो हम को ख़ुद अपनी तलाश है

ये भी शायद ज़िंदगी की इक अदा है दोस्तो

जिस को साथी मिल गया वो और तन्हा हो गया

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