ग़ज़ल 46

शेर 47

शाम से पहले तिरी शाम होने दूँगा

ज़िंदगी मैं तुझे नाकाम होने दूँगा

मैं सोचता हूँ मुझे इंतिज़ार किस का है

किवाड़ रात को घर का अगर खुला रह जाए

ख़िज़ाँ की रुत है जनम-दिन है और धुआँ और फूल

हवा बिखेर गई मोम-बत्तियाँ और फूल

इंतिज़ार करो इन का अज़ा-दारो

शहीद जाते हैं जन्नत को घर नहीं आते

शिकायत उस से नहीं अपने-आप से है मुझे

वो बेवफ़ा था तो मैं आस क्यूँ लगा बैठा

पुस्तकें 1

Pataal

 

1987

 

वीडियो 5

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

साबिर ज़फ़र

Tum apne gird hisaaro ka silsila rakhna

साबिर ज़फ़र

दरीचा बे-सदा कोई नहीं है

साबिर ज़फ़र

दरीचा बे-सदा कोई नहीं है

साबिर ज़फ़र

ऑडियो 8

कोई तो तर्क-ए-मरासिम पे वास्ता रह जाए

ख़ुमार-ए-शब में जो इक दूसरे पे गिरते हैं

दरीचा बे-सदा कोई नहीं है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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