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ग़ुलाम हुसैन साजिद

1951 | मुल्तान, पाकिस्तान

ग़ुलाम हुसैन साजिद

ग़ज़ल 72

शेर 34

रुका हूँ किस के वहम में मिरे गुमान में नहीं

चराग़ जल रहा है और कोई मकान में नहीं

इस अँधेरे में चराग़-ए-ख़्वाब की ख़्वाहिश नहीं

ये भी क्या कम है कि थोड़ी देर सो जाता हूँ मैं

हम मुसाफ़िर हैं गर्द-ए-सफ़र हैं मगर शब-ए-हिज्र हम कोई बच्चे नहीं

जो अभी आँसुओं में नहा कर गए और अभी मुस्कुराते पलट आएँगे

अगर है इंसान का मुक़द्दर ख़ुद अपनी मिट्टी का रिज़्क़ होना

तो फिर ज़मीं पर ये आसमाँ का वजूद किस क़हर के लिए है

एक ख़्वाहिश है जो शायद उम्र भर पूरी हो

एक सपने से हमेशा प्यार करना है मुझे

पुस्तकें 3

Bagh-o-Ragh

 

2021

Hast-o-Bood

Sheri Majmua

2018

Kitaben Aur Yaden

 

2021

 

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