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हकीम मंज़ूर

1937

ग़ज़ल 29

शेर 16

गिरेगी कल भी यही धूप और यही शबनम

इस आसमाँ से नहीं और कुछ उतरने का

मुझ में थे जितने ऐब वो मेरे क़लम ने लिख दिए

मुझ में था जितना हुस्न वो मेरे हुनर में गुम हुआ

हम किसी बहरूपिए को जान लें मुश्किल नहीं

उस को क्या पहचानिये जिस का कोई चेहरा हो

पुस्तकें 6

Khushboo Ka Naam Naya

 

1991

Lahu Lams Chanar

 

1982

Na Tamaam

 

1977

नातमाम

 

1977

शेर आसमान

 

 

Sukhan Barf Zar

 

2003