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साबिर ज़फ़र के शेर

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शाम से पहले तिरी शाम होने दूँगा

ज़िंदगी मैं तुझे नाकाम होने दूँगा

मैं सोचता हूँ मुझे इंतिज़ार किस का है

किवाड़ रात को घर का अगर खुला रह जाए

उम्र भर लिखते रहे फिर भी वरक़ सादा रहा

जाने क्या लफ़्ज़ थे जो हम से तहरीर हुए

मिलूँ तो कैसे मिलूँ बे-तलब किसी से मैं

जिसे मिलूँ वो कहे मुझ से कोई काम था क्या

कुछ बे-ठिकाना करती रहीं हिजरतें मुदाम

कुछ मेरी वहशतों ने मुझे दर-ब-दर किया

ख़िज़ाँ की रुत है जनम-दिन है और धुआँ और फूल

हवा बिखेर गई मोम-बत्तियाँ और फूल

इंतिज़ार करो इन का अज़ा-दारो

शहीद जाते हैं जन्नत को घर नहीं आते

शिकायत उस से नहीं अपने-आप से है मुझे

वो बेवफ़ा था तो मैं आस क्यूँ लगा बैठा

सुब्ह की सैर की करता हूँ तमन्ना शब भर

दिन निकलता है तो बिस्तर में पड़ा रहता हूँ

वो जाग रहा हो शायद अब तक

ये सोच के मैं भी जागता हूँ

बेवफ़ा लोगों में रहना तिरी क़िस्मत ही सही

इन में शामिल मैं तिरा नाम होने दूँगा

वो क्यूँ रूठता मैं ने भी तो ख़ता की थी

बहुत ख़याल रखा था बहुत वफ़ा की थी

नए कपड़े बदल और बाल बना तिरे चाहने वाले और भी हैं

कोई छोड़ गया ये शहर तो क्या तिरे चाहने वाले और भी हैं

'ज़फ़र' है बेहतरी इस में कि मैं ख़मोश रहूँ

खुले ज़बान तो इज़्ज़त किसी की क्या रह जाए

बदन ने छोड़ दिया रूह ने रिहा किया

मैं क़ैद ही में रहा क़ैद से निकल के भी

हर शख़्स बिछड़ चुका है मुझ से

क्या जानिए किस को ढूँढता हूँ

नज़र से दूर हैं दिल से जुदा हम हैं तुम

गिला करें भी तो क्या बे-वफ़ा हम हैं तुम

कैसे करें बंदगी 'ज़फ़र' वाँ

बंदों की जहाँ ख़ुदाइयाँ हैं

मैं ने घाटे का भी इक सौदा किया

जिस से जो व'अदा किया पूरा किया

अजब इक बे-यक़ीनी की फ़ज़ा है

यहाँ होना होना एक सा है

तुम्हें तो क़ब्र की मिट्टी भी अब पुकारती है

यहाँ के लोग भी उकताए हैं चले जाओ

इक-आध बार तो जाँ वारनी ही पड़ती है

मोहब्बतें हों तो बनता नहीं बहाना कोई

हम इतना चाहते थे एक दूसरे को 'ज़फ़र'

मैं उस की और वो मेरी मिसाल हो के रहा

कितनी बे-सूद जुदाई है कि दुख भी मिला

कोई धोका ही वो देता कि मैं पछता सकता

हर दर्जे पे इश्क़ कर के देखा

हर दर्जे में बेवफ़ाइयाँ हैं

अपनी यादें उस से वापस माँग कर

मैं ने अपने-आप को यकजा किया

बना हुआ है मिरा शहर क़त्ल-गाह कोई

पलट के माओं के लख़्त-ए-जिगर नहीं आते

ये ज़ख़्म-ए-इश्क़ है कोशिश करो हरा ही रहे

कसक तो जा सकेगी अगर ये भर भी गया

पहले भी ख़ुदा को मानता था

और अब भी ख़ुदा को मानता हूँ

मैं ऐसे जमघटे में खो गया हूँ

जहाँ मेरे सिवा कोई नहीं है

उस से बिछड़ के एक उसी का हाल नहीं मैं जान सका

वैसे ख़बर तो हर पल मुझ तक दुनिया भर की आती रही

वो लोग आज ख़ुद इक दास्ताँ का हिस्सा हैं

जिन्हें अज़ीज़ थे क़िस्से कहानियाँ और फूल

ये इब्तिदा थी कि मैं ने उसे पुकारा था

वो गया था 'ज़फ़र' उस ने इंतिहा की थी

काश ख़ुद सुकूत भी मुझ से हो हम-कलाम

मैं ख़ामुशी-ज़दा हूँ सदा चाहिए मुझे

शायरी फूल खिलाने के सिवा कुछ भी नहीं है तो 'ज़फ़र'

बाग़ ही कोई लगाता कि जहाँ खेलते बच्चे जा कर

यहाँ है धूप वहाँ साए हैं चले जाओ

ये लोग लेने तुम्हें आए हैं चले जाओ

कहती है ये शाम की नर्म हवा फिर महकेगी इस घर की फ़ज़ा

नया कमरा सजा नई शम्अ जला तिरे चाहने वाले और भी हैं

नामा-बर कोई नहीं है तो किसी लहर के हाथ

भेज साहिल की तरफ़ अपनी ख़बर पानी से

मुड़ के जो नहीं पाया होगा उस कूचे में जा के 'ज़फ़र'

हम जैसा बे-बस होगा हम जैसा तन्हा होगा

सर-ए-शाम लुट चुका हूँ सर-ए-आम लुट चुका हूँ

कि डकैत बन चुके हैं कई शहर के सिपाही

गुज़ारता हूँ जो शब इश्क़-ए-बे-मआश के साथ

तो सुब्ह अश्क मिरे नाश्ते पे गिरते हैं

किसी ज़िंदाँ में सोचना है अबस

दहर हम में है या कि दहर में हम

वो एक बार भी मुझ से नज़र मिलाए अगर

तो मैं उसे भी कोई मेहरबाँ शुमार करूँ

दूर तक एक ख़ला है सो ख़ला के अंदर

सिर्फ़ तन्हाई की सूरत ही नज़र आएगी

इलाज-ए-अहल-ए-सितम चाहिए अभी से 'ज़फ़र'

अभी तो संग ज़रा फ़ासले पे गिरते हैं

पड़ा फ़र्क़ कोई पैरहन बदल के भी

लहू लहू ही रहा जम के भी पिघल के भी

किसी ख़याल की सरशारी में जारी-ओ-सारी यारी में

अपने-आप कोई आएगा और बन जाएगा मेहमान

'ज़फ़र' वहाँ कि जहाँ हो कोई भी हद क़ाएम

फ़क़त बशर नहीं होता ख़ुदा भी होता है

पहला क़दम ही आख़िरी ज़ीने पे रख दिया

या'नी जो दिल का बोझ था सीने पे रख दिया

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Jashn-e-Rekhta | 8-9-10 December 2023 - Major Dhyan Chand National Stadium, Near India Gate - New Delhi

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